भीड़-हिंसा के ‘गुजरात मॉडल’ का ताजातरीन निशाना हैं प्रवासी मजदूर

पिछले महीने के शुरू में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के हजारों प्रवासी मजदूरों को जहर भरे ढंग से ‘बाहरी लोग’ कहकर निशाना बनाया गया और उन पर बर्बरतापूर्ण हमले चलाये गये. 28 सितम्बर 2018 को गुजरात के सबरकांठा जिले में एक नाबालिग लड़की पर तथाकथित बलात्कार के आरोप में बिहार से आये एक प्रवासी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, उसके बाद से ही प्रवासी लोगों को निशाना बनाकर लाठियों और पत्थरों से पीटकर जख्मी किया गया और सोशल मीडिया में नफरत भरे संदेश प्रसारित किए गये. इस बड़े पैमाने की हिंसा की चपेट में गुजरात के कई जिले - सबरकांठा, पाटन, मेहसीना, गांधीनगर और अरावली - प्रभावित हुए हैं.

जब गुजरात से भारी पैमाने पर लोगों के पलायन के बारे में अधिकारियों से सवाल किया तो राज्य पुलिस और भगवा ब्रिगेड ने पूरी बेहयाई से जवाब दिया कि लोग तो दीवाली और छठ जैसे त्यौहारों के चलते अपने घर की ओर पलायन कर रहे हैं! इससे ज्यादा बेढंगी बात कुछ और हो ही नहीं सकती: ये त्यौहार एक महीने बाद यानी नवंबर में होने थे, और प्रवासी मजदूर आम तौर पर त्यौहारों के महज चंद दिन पहले ही अपने घर की ओर रवाना होते हैं. इसके अलावा, उसी गुजरात पुलिस ने दावा किया है कि उसने गैर-गुजराती लोगों पर हमला करने के आरोप में गुजरात के विभिन्न हिस्सों में कोई 342 लोगों को गिरफ्तार किया. अगर गुजरात में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है तो उन्हें इतनी बड़ी तादाद में लोगों को गिरफ्तार करने की क्या जरूरत आ पड़ी?

इससे भी बदतर बात यह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन हिंसात्मक हमलों को महज अफवाह बताकर तुच्छ करके दिखाने की कोशिश की, कि ये अफवाहें उन्होंने फैलाई हैं जो गुजरात के ‘विकास’ से जल मरते हैं! योगी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं, या मोदी के तथाकथित ‘गुजरात मॉडल’ के प्रचारक? बिहार और उत्तर प्रदेश में, तथा गुजरात में भी - सभी भाजपा शासित सरकारों ने आपस में सांठगांठ करके प्रवासी मजदूरों को नफरत भड़काने वाले गिरोहों की दया के हवाले कर दिया है.

वास्तव में ये हमले विकास के तथाकथित ‘गुजरात मॉडल’ की असलियत की पोल खोलकर रख देती हैं, जिसकी तारीफों के पुल नरेन्द्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के लिये बांधे थे. गुजरात के वाघोडिया जिले के डिप्टी एस.पी., एच.डी. मेवाडा ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि समूचा घृणा-प्रचार अभियान इसी भावना को भड़काते हुए फैलाया गया कि ये ‘बाहरी’ मजदूर गुजरातियों के रोजगार के अवसर छीन रहे हैं. दरअसल मोदी का ‘गुजरात मॉडल’ राज्य के स्थानीय युवकों के लिये सम्मानजनक रोजगार की संभावनाएं पैदा करने के मामले में दयनीय रूप से नाकाम रहा है.

लेकिन इसका गुस्सा, सरकार की चरम नाकामी के खिलाफ लक्षित करने के बजाय, बड़ी चतुराई से और दुष्टतापूर्वक प्रवासी मजदूरों के खिलाफ केन्द्रित कर दिया गया. और ऐसा गुजरात में पहली बार नहीं हो रहा है. राज्य में कृषि की बदहाली और भारी पैमाने पर फैली बेरोजगारी जैसे ज्वलंत मुद्दों से जनता का ध्यान बंटाने के लिये आरएसएस और भाजपा बारम्बार ‘बाहरी लोगों’ या ‘दूसरे लोगों’ - धार्मिक अल्पसंख्यकों (2002 के दंगे), दलितों (जैसा कि ऊना में कोड़ों से पिटाई के दौरान देखा गया) और इस बार प्रवासी मजदूरों - के खिलाफ नफरत और हिंसा भड़काने का सहारा लेते रहे हैं. यह अत्यंत निंदनीय है कि गुजरात में कांग्रेस के एक विधायक को भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ पूर्वाग्रह भड़काने वाले भाषण देते हुए सुना गया है - हालांकि समूचे देश में इसके खिलाफ आक्रोश और निंदा का स्वर उठने के बाद उन्होंने अपना ढर्रा बदल लिया.

अब यह बिल्कुल स्पष्ट हो चला है कि सरकार सारे मोर्चों पर - कृषि की बदहाली से निपटने से लेकर पेट्रोल-डीजल की कीमतें कम करने, शिक्षा से लेकर रोजगार के अवसर पैदा करने तक - चरम रूप से विफलता का सामना कर रही है. अब इन मुद्दों से जनता का ध्यान दूसरी ओर भटकाने के लिये भगवा ब्रिगेड बड़ी बेताबी से हर रोज एक नये दुश्मन को सामने पेश कर रही है ताकि उनके खिलाफ पूर्वाग्रह और नफरत को भड़काया जा सके: ‘राष्ट्र-विरोधी’, ‘अर्ध-माओवादी’, ‘अर्बन नक्सल’, ‘बांग्लादेशी घुसपैठिये’, ‘दीमक’.... और उनके झूठों की सूची लम्बी होती जा रही है! फासीवादी शासन ने अपनी भारी नाकामी को ढंकने के लिये एक बिल्कुल स्पष्ट ध्येय अपना लिया है - ‘बांटो, भटकाओ और शासन करो’. संघ ब्रिगेड की समूची राजनीति ही ‘बाहरी’, ‘घुसपैठिया’ या ‘दूसरे लोगों’ की अवधारणा पैदा करने पर निर्भर है.

मगर हमें घृणा-प्रचार अभियान का मुंहतोड़ जवाब देना होगा. हमें सभी लोगों को सम्मान, और सबके लिये मानवाधिकार को बुलंद करना होगा, और हमारी अपनी जनता के साथ, उनकी अपनी ही भूमि पर पराये लोगों जैसा बरताव किए जाने के हर प्रयास का प्रतिरोध करना होगा. हमें प्रवासियों और शरणार्थियों के साथ भी सम्मानजनक आचरण करने पर पूरा जोर देना होगा.

 

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वर्षः 13
अंकः 8