मोदी के भारत में मार्क्स की 200वीं जन्मवार्षिकी: मार्क्स के विचार प्रतिरोध के हथियार हैं

हम मार्क्स के जन्म की द्विशतवार्षिकी मना रहे हैं. एक ऐसे समय, जब संघ ब्रिगेड ने लोकतंत्र पर जहरीला हमला कर दिया है और वह समूचे देश और समाज पर संघ की विचारधारा को जबरदस्ती थोप देने की कोशिश कर रहा है, तब मार्क्स की 200वीं जन्मवार्षिकी हमें मार्क्स के क्रांतिकारी विचारों को व्यापक रूप से प्रसारित करने और उन पर चर्चा करने तथा लोकतंत्र, आजादी और बराबरी के लिये एक सशक्त संग्राम छेड़ देने का हमें बहुत बड़ा मौका दे रही है.

मार्क्स की ताकत को फासिस्ट लोग खूब जानते हैं. पूरी बीसवीं सदी में, दुनिया में जब कभी और जहां कहीं फासिस्टों ने अपना कुत्सित सिर उठाया है, मार्क्स के अनुयाइयों ने दिलोजान से उनसे लड़ाई चलाई है और उनको इतिहास के कूड़ेदान में दफन कर दिया है. उनके प्रतीक-पुरुष हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सोवियत संघ की लाल फौज ने ही शिकस्त दी थी. यह महज कोई सामरिक विजय नहीं थी, बल्कि सबसे बढ़कर यह एक महान विचारधारात्मक विजय थी जिसने दुनिया भर में स्वतंत्रता, लोकतंत्र और समानता की शक्तियों को प्रेरित किया था और उनको शक्ति प्रदान की थी. आज जब हम भारत में सत्ताधारी फासिस्टों का प्रतिरोध कर रहे हैं तो हमारे पास मार्क्स जैसा एक महान मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक मौजूद है.

सचमुच, मार्क्स अपने जीवनकाल में भारत के एक महान मित्र और शुभाकांक्षी रहे थे. संघ ब्रिगेड की सोच है कि वे बस इतना कहकर कि मार्क्स तो विदेशी थे, उनको हमसे दूर रख सकते हैं. सच है कि मार्क्स जर्मन थे और उन्होंने कभी भारत का दौरा नहीं किया था. लेकिन 1850 के दशक से शुरू करके 1883 में अपने जीवन की अंतिम सांस गिनने तक, वे लंदन में बसे थे जो ब्रिटिश उपनिवेशवादियों की राजधानी था, और ये ब्रिटिश भारत को लूट रहे थे और उसका दमन कर रहे थे. लंदन में बैठकर मार्क्स पूंजी पर पड़े रहस्य का पर्दा हटा रहे थे और तमाम देशों के मेहनतकश वर्गों को पूंजी के शोषण के खिलाफ लड़ने के लिये प्रोत्साहित कर रहे थे. भारत में अभी तक आधुनिक मजदूर वर्ग का काफी हद तक उदय नहीं हुआ था, मगर उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन शुरू हो चुके थे और मार्क्स बड़ी उम्मीद के साथ उन आंदोलनों पर नजर टिकाये थे.

ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने अपने औपनिवेशिक शासन को सभ्यता प्रसार के महान मिशन के आवरण में लपेटकर पेश करने की कोशिश की थी. उन्होंने भारत में अपने शोषण को विकास और सशक्तीकरण के एक महान प्रयास के बतौर दिखाने की कोशिश की थी. मार्क्स ने सुनियोजित ढंग से इस झूठे आख्यान को चुनौती दी और भारत में औपनिवेशिक शासन के असली चरित्र का पर्दाफाश किया. जुलाई 1853 में ही, महान संथाल विद्रोह (हूल) के दो वर्ष पहले और 1857 के ऐतिहासिक विद्रोह से चार वर्ष पहले मार्क्स भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की समाप्ति का सपना देख रहे थे, जो उनकी नजर में या तो ब्रिटेन में सर्वहारा क्रांति के जरिये या फिर भारतवासियों के औपनिवेशिक जुआ उतार फेंकने लायक पर्याप्त शक्तिशाली हो जाने के जरिये साकार हो सकता था. एक तरह से यह भारत की स्वतंत्रता की पहली राजनीतिक दृष्टि थी, भारत पर औपनिवेशिक कब्जा के वास्तविक तौर पर समाप्त होने के लगभग एक शताब्दी पहले ही.

जहां मार्क्स ने ब्रिटेन द्वारा अपने देश में लोकतंत्र की डींगें हांकने और उपनिवेशों को बर्बर पुलिस राज्य में तबदील करके शासन करने के ब्रिटिश पाखंड का पर्दाफाश किया, वहीं वे ब्रिटिश-पूर्व भारतीय व्यवस्था के भी प्रशंसक नहीं थे. उनके लिये स्वयं-सम्पूर्ण ग्रामीण समुदायों का मिथक आदर्श नहीं था, वे भारत में जाति व्यवस्था और सामाजिक गुलामी के बारे में भी इतना जानते थे कि उन्होंने भारतीय समाज प्रणाली को पूरब की स्वेच्छाचारी निरंकुश प्रणाली के बतौर वर्णित किया था. फुले जैसे भारतीय चिंतकों ने भी औपनिवेशिक भारत की आंतरिक सामाजिक स्थिति का वर्णन करने के लिये ‘गुलामगीरी’ जैसे कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया है. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के किसी सच्चे विवरण में औपनिवेशिक शासकों से स्वतंत्रता और मार्क्स के शब्दों में पूरब की स्वेच्छाचारी निरंकुश प्रणाली, जिसे फुले गुलामगीरी कहते हैं, के खात्मे पर समान रूप से केन्द्रित करना जरूरी है.

सोवियत संघ के पतन के बाद समूची दुनिया में पूंजीवाद के पैरोकारों ने विजयोल्लास से घोषणा कर दी कि उन्होंने अब हमेशा के लिये मार्क्स को दफन कर दिया है. लेकिन जैसे ही इक्कीसवीं सदी का सबेरा आया और पूंजीवाद ने खुद को अपने एक सबसे बड़े संकट में फंसा पाया, तो मार्क्स एक जबरदस्त धमाके के साथ फिर वापस आ गये. हर बार जब पूंजीवाद एक नए संकट के सामने खड़ा होता है, तो पूंजी के प्रबंधक भी इस संकट को समझने के लिये मार्क्स को दुबारा पढ़ते हैं. हां जरूर, सोवियत संघ का पतन बीसवीं सदी के अंत में कम्युनिस्ट शिविर के लिये एक बड़ा धक्का था, मगर इसने मार्क्स और मार्क्सवाद को सोवियत मॉडल की जकड़न से मुक्त कर दिया है और दुनिया भर में कम्युनिस्टों को मजबूर किया है कि वे सोवियत पतन के बाद वाली दुनिया की स्थितियों का मुकाबला करें और अब हमारे पास सोवियत पतन के बाद उभरने वाले मार्क्सवादियों की एक पीढ़ी है जो सोवियत पतन के बोझ तले नहीं दबी हुई है.

अपने जीवनकाल में मार्क्स ने खुद को किसी एक मॉडल के साथ सम्पूर्णतः सीमित नहीं रखा. यूरोप में प्रगतिशील क्रांतियों का पूर्वाभास करके उन्होंने अपने सबसे घनिष्ठ सहयोद्धा फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर फरवरी 1848 में कम्युनिस्ट घोषणापत्र की रचना की. ये क्रांतियां 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से, जिसने दुनिया को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का आहृान दिया था, से एक कदम आगे बढ़कर होने वाली थी. लेकिन वास्तविक जीवन में 1848 की क्रांतियां यूरोप के लिये पीछे मुड़ने का बिंदु बन गईं, जहां पूंजीवादी शासनों ने मजदूर वर्ग के आगे बढ़ने की संभावनाओं पर लगाम लगाते हुए खुद को और सुदृढ़ कर लिया. इसके बाद से लेकर 1871 के पैरिस कम्यून तक यूरोप को मजदूर वर्ग के विद्रोह की कोई झलक नहीं मिली और यहां तक कि पैरिस कम्यून का उभार भी सत्तर दिनों से ज्यादा नहीं टिका रह सका, हालांकि उसने समाजवादी स्वप्नदृष्टि को ठोस आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान किया. मजदूर वर्ग के आंदोलनों को इंटरनेशनल वर्किंगमेन्स एसोसियेशन, जिसे दुनिया के इतिहास में प्रथम इंटरनेशनल के नाम से जाना गया, के बैनर तले एक साथ लाने का मार्क्स का ध्येय, पैरिस कम्यून के पतन के धक्के को तथा उसके बाद शुरू होने वाले कार्यनीतिक बहस-मुबाहिसे को नहीं बर्दाश्त कर सका और टिक नहीं पाया. यह हमें दिखलाता है कि मार्क्स के विचार कभी भी व्यावहारिक सफलता के तथाकथित बड़े-बड़े मॉडलों के आधार पर नहीं लोकप्रिय हुए, बल्कि वे इन धक्कों और दमन को धता बताते हुए लगातार इसलिये फैलते रहे क्योंकि वे अनुभूत की जा रही आवश्यकताओं और सामाजिक बदलाव की तीव्र साझी आकांक्षा को प्रतिबिम्बित करते थे, जिसका लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जो पूंजीवाद के संकटों और अस्तव्यस्तता से तथा उसकी बर्बरता से परे हो.

अपने जन्म के दो सौ वर्ष बीतने के बावजूद मार्क्स का नाम आज भी लोगों के कानों में गूंजता है तो इसकी वजह यह है कि वे बदलाव के दार्शनिक और जोशीले हिमायती थे. पूरे जीवन भर वे अपनी इस कथनी को करनी में बदलते रहे कि दार्शनिकों ने तमाम तरह से दुनिया की व्याख्या की है, मगर सवाल इसको बदलने का है. और उन्होंने कम्युनिस्ट घोषणापत्र लिखने से पहले ही जिस पद्धति को सूत्रबद्ध किया था, उससे खुद भी बंधे रहे: जो कुछ भी विद्यमान है उसकी निर्मम आलोचना. यह निर्ममता दो अर्थों में होगी - खुद आलोचना के परिणामों को भोगने के अर्थ में और शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाने वाली सरकारों द्वारा किये जाने वाले दमन को बर्दाश्त करने के अर्थ में. मगर मार्क्स ने समानता और मुक्ति पर आधारित किसी समाज के निर्माण की विस्तृत रूपरेखा या योजना पेश करने का कभी प्रयास नहीं किया. विस्तृत रूपरेखा बनाने के काम को आने वाली पीढ़ियों के लिये छोड़ दिया गया. मार्क्स के सामने महत्वपूर्ण काम था वर्तमान में बदलाव के लिये इसी जगह लड़ाई चलाना, इसमें इतिहास ने उनके सामने चाहे जो भी सामग्री जुटा रखी हो या जो भी परिस्थितियां पेश कर रखी हों. उनके विचार से प्रकृति और सामाजिक जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र बने रहनी वाली चीज थी और यह परिवर्तन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है. यह प्रक्रिया निरंतर तो है मगर रैखिक गति में चलने वाली नहीं है, क्योंकि जीवन हमेशा टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर चलता है और उतार-चढ़ाव से गुजरता रहता है. अतः मार्क्स के विचार से परिवर्तन के लिये न तो कोई न्यूनतम प्रस्थान बिंदु होता है और न ही कोई भी संदर्भ परिपूर्ण होता है. मार्क्सवाद हमें किसी भी परिस्थिति में बदलाव के लिये लड़ने को प्रेरित करता है और उसकी शक्ति प्रदान करता है.

मार्क्स ने हमारे सामने पूंजी के रहस्य को खोलकर रख दिया, वह पूंजी जिसका सृजन विकास के क्रम में मानव समाज द्वारा किया गया था, और अब वही पूंजी मानव जाति चाहे कुछ भी करे, सबकुछ की शर्तें तय कर देती है. हमें सिखाया जाता है कि हम पूंजी को उत्पादन का एक प्रमुख तत्व अथवा जमीन या प्राकृतिक संसाधन एवं मानव श्रम के अलावा उत्पादन का एक संघटक मानें. लेकिन प्राकृतिक संसाधन या जीवित श्रम से भिन्न, पूंजी में कुछ भी प्राकृतिक तत्व नहीं है. मार्क्स हमें पूंजी के निर्माण और संचय की प्रक्रिया तक ले जाते हैं, वे उस निर्दयता और हिंसा का, लूट-खसोट का, गुलामी और अमानवीकरण का पर्दाफाश करते हैं जो मार्क्स के शब्दों में पूंजी के आदिम संचय के साथ अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है और जिसे हम आज भी दुनिया भर में, खासकर पूंजी-निर्देशित विकास की दौड़ में पीछे रह गये देशों और अंचलों में, लोगों से उनके संसाधनों को जबरन छीने जाने के विभिन्न रूपों में आज भी जारी देखते हैं. मार्क्स के अविस्मरणीय शब्दों में, अगर मुद्रा एक गाल में खून का सहजात धब्बा लेकर इस दुनिया में आती है, तो पूंजी सिर से पैर तक, अंग-अंग में खून और कीचड़ में लथपथ रूप में सामने आती है.

हमें यह पढ़ाया जाता है कि विकास की जड़ें पूंजी में निहित हैं, पूंजी ही आधुनिक मानव सभ्यता का केन्द्र है; कि उत्पादन और रोजगार का स्रोत पूंजी है. मार्क्स हमें बताते हैं कि पूंजी की केन्द्रवस्तु और कुछ नहीं मुनाफा है. वही एकमात्र उद्देश्य है जिसके लिये पूंजी का अस्तित्व है और मार्क्स ने अपनी सहमति जताते हुए अपने जमाने के एक ट्रेड यूनियन नेता का वक्तव्य उद्धृत किया है, यह दिखाने के लिये कि कैसे मुनाफे का हिस्सा बढ़ाते जाने में पूंजी अपना असली चरित्र दिखला देती है. अगर 10 प्रतिशत मुनाफा निश्चित हो तो पूंजी कहीं भी लग जायेगी, 20 प्रतिशत मुनाफा मिले तो पूंजी यकीनन बेचैन हो उठेगी और 50 प्रतिशत मुनाफे पर तो पूरी तरह उद्दंडता दिखलाने लगेगी. और 100 प्रतिशत मुनाफा मिलेगा तो वह तमाम मानवीय कानूनों को बूटों तले कुचलने को तैयार हो जायेगी; 300 प्रतिशत मुनाफा मिलने पर तो कोई ऐसा अपराध नहीं है जिसे करने में पूंजी हिचकेगी, कोई ऐसा जोखिम नहीं जिसे पूंजी न उठायेगी, यहां तक कि अपने मालिक के फांसी के फंदे में लटकने का जोखिम तक उठायेगी. पूंजी के स्वरूप बदलते गये हैं, अब उसकी गति इलेक्ट्रॉनिक हो गई है, अब वह सचमुच समूचे विश्व को अपना मंच मानती है और कोई सीमा या बाधा नहीं मानती. अमरीकी आविष्कर्ता ट़ॉमस अल्वा एडिसन का सुप्रसिद्ध कथन था कि जीनियस बनने में एक प्रतिशत हिस्सा प्रेरणा का होता है तो 99 प्रतिशत पसीना बहाने का होता है. उनके ही कथन की तर्ज पर आज कहा जा सकता है कि पूंजी का कारोबार आज एक प्रतिशत उत्पादन और 99 प्रतिशत सट्टेबाजी हो गया है. जब पूंजी उत्पादन में लगती है तो वह श्रमशक्ति से अतिरिक्त मूल्य बटोर लेती है और वास्तविक उत्पादन का झंझट मोल लेने के दायरे से बाहर जाकर सट्टेबाजी के जरिये बुलबुले पैदा करने लगती है जो समय-समय पर फूट जाते हैं और क्रमशः अधिक से अधिक वैश्वीकृत होते अर्थतंत्र को और भी गहरे एवं व्यापक संकटों में धकेल देते हैं.

मार्क्स हमें बताते हैं कि मुद्रा या मशीनें पूंजी की अंतर्वस्तु नहीं हैं, पूंजी की अंतर्वस्तु उस सामाजिक शक्ति में निहित है जिसके जरिये पूंजी के मालिकों को काम करने की जरूरत नहीं होती और जिनके पास पूंजी नहीं है वे अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिये श्रमशक्ति बेचने को मजबूर हो जाते हैं, चाहे वह शारीरिक हो या बौद्धिक श्रमशक्ति. पूंजी के शासन को राज्य द्वारा लागू किया जाता है. मगर ठीक जैसे पूंजी एक सामाजिक संरचना है, वैसे ही राज्य भी सामाजिक संरचना है. और एक ऐसे समाज की कल्पना करना और उसे हासिल करना संभव है जो पूंजी और इसी तरह राज्य से परे जा सकती है जहां समाज स्वतंत्र उत्पादकों का संघ होगा या स्वाधीन रूप से जुड़े हुए व्यक्तियों का समुदाय होगा, एक ऐसा संघ जहां प्रत्येक व्यक्ति का उन्मुक्त विकास तमाम लोगों के स्वतंत्र विकास की पूर्वशर्त होगा. यही मार्क्स की स्वप्नदृष्टि में साम्यवाद या कम्युनिज्म था, जहां हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार समाज में योगदान करेगा और समाज उसे उनकी आवश्यकता के अनुसार प्रदान करेगा.

मार्क्स हमें पूंजी और पूंजीवाद से परे एक समाज की कल्पना और उसके निर्माण के लिये प्रेरणा देते हैं. इसको समझने के लिये आइये, हम किसी खेतिहर समाज का सहजलब्ध उदाहरण लें, जहां अर्थतंत्र में कृषि उत्पादन की प्रधानता है. हमें कृषिकार्य के लिये क्या चाहिये? हमें खेती योग्य जमीन चाहिये, हमें खेती के उपकरण और लागत सामग्री चाहिये, हमें खेती करने की तकनीक चाहिये और निश्चित तौर पर हमें श्रम की भी जरूरत है, अब चाहे किसान खुद अपना श्रम दे या फिर भाड़े पर लिये गये कृषि-श्रमिकों के जरिये हासिल करे. लेकिन क्या हमें किसी जमींदार की भी जरूरत है जिसके पास सैकड़ों एकड़ जमीन हो? आज इसका जवाब स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है कि ऐसी जरूरत नहीं है, जब जमींदारी का कानूनी तौर पर विलोप कर दिया गया है और हम जानते हैं कि जमींदारी के विलोप ने कृषि के विकास में वास्तव में योगदान ही किया है. इस तरह, अगर खेतिहर अर्थतंत्र के संदर्भ में जमींदार को अनावश्यक बना दिया गया है, तो क्या हमें औद्योगिक उत्पादन, व्यापक रूप से विस्तृत सेवा क्षेत्र और विशिष्ट ज्ञान पर आधारित आधुनिक अर्थतंत्र के लिये वास्तव में किसी पूंजीपति या पूंजी के निजी मालिक की जरूरत है? इसका जवाब भी नकारात्मक ही होना चाहिये. हमें फैक्टरियों और कार्यस्थलों की जरूरत है, हमें मशीनों और तकनीक की भी जरूरत है, हमें आपस में घनिष्ठ समन्वय रखकर काम करने वाले मजदूरों की जरूरत है, हमें वैज्ञानिकों और इंजीनियरों और निरीक्षकों की जरूरत है जो उत्पाद की गुणवत्ता का निरीक्षण-परीक्षण करें और यहां तक कि कार्य और कामगारों का संगठन एवं प्रबंधन करने के लिये विभिन्न उपायों की भी जरूरत है. हमें जिस व्यक्ति की जरूरत नहीं है, वह है कारोबारी साम्राज्य का मालिक जिसे उत्तराधिकार में कारोबार मिल जाता है, जो वास्तव में परजीवी की भूमिका निभाता है जो उत्पादन प्रक्रिया एवं समग्र अर्थतंत्र के हर आवश्यक पहलू और संघटक अंग पर वर्चस्व कायम किये रहता है. श्रम के समाजीकरण के साथ ताल मिलाकर मालिकाने का हस्तगतकरण करके समाजीकरण कर दिया जाय, तो पूंजीवाद अपनी जड़ों से हिल जाता है.

पूंजी के अमानवीयकरण करने वाले शासन से शुरू करके सर्वसम्पूर्ण मानव स्वतंत्रता के इस राज्य तक का सफर छोटे और बड़े किस्म के तमाम बदलावों से, छोटे-छोटे और बड़े-बड़े कदमों से, सुधारों और क्रांतियों से भरा पड़ा है. और यही वह संदर्भ है जिसमें मार्क्स वर्ग संघर्ष की बात करते हैं, जो क्रांतिकारी सिद्धांत और व्यवहार की मुख्य गतिशीलता है. वर्ग संघर्ष की शुरूआत तो वर्गों में विभाजित समाज और वर्गीय शासन के उदय के साथ होती है और मार्क्स ने इसके आविष्कार के श्रेय का कोई दावा नहीं किया. उनका ऐतिहासिक योगदान वर्ग संघर्ष की गतिशीलता को कम्युनिज्म की नियति के साथ जोड़ देने में निहित है.

स्वाभाविक तौर पर मार्क्स किसी फौरी किस्म के और विशेष हित को लेकर परस्पर लड़ रहे दो विरोधी वर्गों के सीमित संदर्भ में वर्ग संघर्ष की बात नहीं कर रहे हैं. वह तो अकसर वर्ग संघर्ष का पहला कदम होता है, और जब श्रम एवं पूंजी के बीच चलने वाली निरंतर छापामार लड़ाई के बीच से ट्रेड यूनियनें आकार ग्रहण करती हैं, तो मजदूर आम तौर पर यह पहला कदम बिल्कुल सहजात प्रवृत्ति के बतौर उठाते और सीखते हैं. मार्क्स सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में वर्ग संघर्ष की बात करते हैं. वे हमें वर्गीय शासन के गोपनीय रहस्य से परिचित कराते हैं और वर्ग संघर्ष के जरिये वे वर्तमान वर्गीय शासन को चुनौती देना तथा उसे सम्पूर्ण रूप से उखाड़ फेंकने की कोशिश करते हैं. जब हम वर्गीय शासन की बात करते हैं तो हम आम तौर पर उसके दो स्तम्भों की बात करते हैं - पूंजी और राज्य. पूंजीवादी समाजों में चंद हाथों में पूंजी का केन्द्रीकरण और इसी कारण से हमेशा बढ़ती जाती असमानता ऐसे तथ्य हैं जिन्हें व्यापक तौर पर स्वीकारा जाता है. ‘ऑकुपाई वॉल स्ट्रीट’ आंदोलन ने इसकी अभिव्यक्ति शिखर पर बैठे 1 प्रतिशत लोगों की सत्ता और विशेषाधिकार के खिलाफ 99 प्रतिशत वंचितों की लड़ाई के रूप में की थी. ब्रिटेन में कोर्बिन के प्रचार अभियान ने अपनी अभिव्यक्ति के बतौर इस नारे का इस्तेमाल किया था: ‘चंद लोगों के लिये नहीं, बहुसंख्यकों के लिये’. जब राज्य सांस लेने काबिल स्वच्छ हवा और पीने योग्य पानी की खातिर किसी प्रदूषणकारी प्लांट को बंद करने की मांग करते निहत्थे लोगों पर गोली चलाता है तो वर्चस्वशाली वर्ग के शासन के अंग के बतौर राज्य की भूमिका बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है.

मगर यदि हम मार्क्स को थोड़ा ध्यान से पढ़ें तो हम पायेंगे कि वे हमारा ध्यान एक तीसरे स्तम्भ की ओर खींच रहे हैं - विचारों का परिक्षेत्र. मार्क्स कहते हैं कि हर जमाने में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार हो ते हैं. दूसरे शब्दों में शासक वर्ग निरंतर विचारों के परिक्षेत्र में अपने शासन को जायज ठहराते रहते हैं. चोम्स्की इसको सहमति का परिनिर्माण कहते हैं. अतएव, वर्चस्वशाली वर्ग के शासन को चुनौती देने तथा उसे उखाड़ फेंकने के लिये सभी मोर्चों पर लड़ाई लड़ना आवश्यक है - आर्थिक नियंत्रण के खिलाफ, राजनीतिक नियंत्रण के खिलाफ और साथ ही विचारधारात्मक नियंत्रण के खिलाफ. कई लोग जो सोचते हैं कि मार्क्स को भारत में इसलिये लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि भारत में जाति और धर्म का वर्चस्व है, वास्तव में वर्ग संघर्ष के इस अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक आयाम को भूल ही जाते हैं.

भारत में प्रभुत्वशाली विचार क्या हैं? हम आसानी से देख सकते हैं कि भारत में अधिकांश प्रभुत्वशाली विचार बदलाव और सामाजिक गतिशीलता के खिलाफ बड़े जोरदार ढंग से खड़े हैं. हमें लगातार यही बताया जाता है कि हर चीज भाग्य के जरिये पहले से तय है, तुमको इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिये कि इस जिंदगी में तुमको कब क्या मिल रहा है, क्योंकि यह निर्धारित है कि तुम्हें उपयुक्त समय पर, उपयुक्त मात्रा में, उपयुक्त वस्तु मिल जायेगी. हमें बताया जाता है कि अभी हमें जो कुछ मिल रहा है, वह हमारे पूर्व जन्म के कर्मों का फल है, और आज हम जो अच्छे काम कर रहे हैं उनका पुरस्कार हमें अगले जन्मों में मिलेगा. हमें फल या पुरस्कार की चिंता किये बगैर काम करते जाने को प्रोत्साहित किया जाता है. हमें बताया जाता है कि जीवन में आम हिन्दू का स्थान उसके जन्म के समय ही उसकी जाति के जरिये निर्धारित हो जाता है क्योंकि जाति ईश्वर द्वारा निर्धारित की गई संस्था है और उसकी सीमाओं या बंधनों को नहीं लांघना चाहिये. महिलाओं को हर तरीके से यह बताया जाता है कि वे पुरुषों से निम्नतर हैं और उनका काम समुदाय, जाति और परिवार की कठोर सीमाओं में बंधकर जीवन भर पुरुष की सेवा करना है, उनकी खामोशी और बलिदान को महिमामंडित किया जाता है जबकि स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में अपने अधिकारों को हासिल करने की उनकी हर कोशिश पर प्रतिबंध लगाया जाता है और उन्हें दंडित किया जाता है. यकीनन मनुस्मृति इन प्रतिगामी विचारों को सूत्रबद्ध आकार देने वाली संभावित सबसे निर्मम संहिता है तथा मनुस्मृति एवं ब्राह्मणवाद के अन्य ग्रंथ (वेद-पुराण-उपनिषद) भारत में नारी-विद्वेष, अस्पृश्यता और सामाजिक गुलामी के विचारधारात्मक स्रोत हैं.

अतः वर्ग संघर्ष का कोई मार्क्सवादी सिद्धांत और उसके व्यवहार को अवश्य ही इन तमाम वर्चस्वशाली तथा जड़ जमाये बैठे विचारों के खिलाफ जोशीला संघर्ष छेड़ना होगा, जो विचार यथास्थिति को जायज ठहराते हैं और किसी भी किस्म के सामाजिक परिवर्तन एवं गतिशीलता में बाधा डालते हैं. इस तरह से देखा जाय तो जाति और वर्ग के बीच कोई चीन की दीवार नहीं खड़ी है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मार्क्स ने फुले के बारे में और फुले ने मार्क्स के बारे में सुना था या नहीं, सच्चाई यह है कि फुले ने 1873 में भारत में जातिगत और लैंगिक दोनों पहलुओं से सामाजिक गुलामी के खिलाफ जो लिखा था वह आज भी विचारधारा के परिक्षेत्र में वर्ग संघर्ष को किया गया एक प्रमुख योगदान है. इससे भी फर्क नहीं पड़ता कि अंततः अम्बेडकर मार्क्स से किस हद तक सहमत हुए थे, 1936 में जाति के विनाश का उनका उदात्त आहृान जो संदेश दे गया उसे भारत के वर्ग संघर्ष में एक प्रमुख जोर देने वाले विषय के बतौर स्वीकार किया जाना चाहिये और आत्मसात किया जाना चाहिये. सचमुच, जब अम्बेडकर कहते हैं कि जाति श्रम-विभाजन से नहीं बल्कि श्रमिकों के विभाजन से सम्बंधित है, तो वे वास्तव में जाति-विरोध के आधार पर मजदूरों की एक वर्ग के बतौर एकता के निर्माण का ही आहृान करते हैं. जाति का विनाश भारत में वर्गीय ध्रुवीकरण को अंजाम देने के लिये सबसे महत्वपूर्ण एवं क्रांतिकारी कदमों में से एक है. सचमुच, कम्युनिस्ट घोषणापत्र ने अपनी भविष्य-दृष्टि से देखा था कि सर्वहारा, जो समाज का सबसे निचला तबका है, का उत्थान ‘अपनी पीठ पर लदे समूचे सरकारी समाज को हवा में तितर-बितर कर उड़ा देगा.’ जातिगत ऊंच-नीच अनुक्रम और पुरुषसत्ता भारत में ‘सरकारी समाज’ के प्रमुख स्तम्भ हैं और सर्वहारा केवल तभी सिर उठा सकता है जब वह इस सरकारी समाज की समूची इमारत को निर्णायक चोट देकर गिरा दे.

कम्युनिस्ट घोषणापत्र में मार्क्स और एंगेल्स ने मजदूर वर्ग को लोकतंत्र की लड़ाई को जीतने और स्वयं को एक राष्ट्र के बतौर घोषित करने का कार्यभार सौंपा था. किसी वर्ग-विभाजित समाज में मजदूर वर्ग के नेतृत्वकारी या शासक वर्ग के रूप में उभरने का यही प्रमुख महत्व है. आज भारत में हमारे सामने न सिर्फ पूंजी का आम किस्म का वर्गीय शासन चल रहा है, बल्कि हम जिस चीज का मुकाबला कर रहे हैं वह किसी फासिस्ट शासन से कम नहीं, जो सबसे निर्लज्ज किस्म के क्रोनी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद की ताबेदारी को आक्रामक बहुसंख्यकवाद और जातिगत एवं लैंगिक हिंसा एवं उत्पीड़न के साथ मिलाकर सत्तारूढ़ है. भारत के संविधान में रोज-ब-रोज तोड़फोड़ की जा रही है तथा उसे ताक पर रख दिया गया है, और राजसत्ता एवं शासक पार्टी के खुले संरक्षण और संरक्षकत्व में भीड़-हत्या गिरोह शासन चला रहे हैं, और हर पूंजीवादी गणराज्य की बुनियादी आधारशिला कहे जाने वाले कानून के राज की जगह यही रोजमर्रे की बात बन गई है. भारत के इतिहास में सर्वाधिक प्रतिगामी विचार और प्रवृत्तियां, जिनका स्थान उपनिवेश-विरोधी संघर्ष के दौरान मुख्यतः हाशिये पर ही रहता था, अब संसदीय तख्तपलट के जरिये सत्ता में आ गई हैं और चुनावी जीत को राजसत्ता को अपने अनुरूप ढालने तथा सर्वाधिक प्रतिगामी आधार पर समाज को कतारबद्ध करने के लाइसेन्स के बतौर इस्तेमाल कर रही हैं. भारतीय जनता की व्यापकतम एकता कायम करके और सबसे साहसिक प्रतिरोध खड़ा करने के जरिये इस फासीवादी साजिश को शिकस्त देने के लिये मार्क्स की सामग्रिक समझदारी रखना आज बहुत जरूरी हो गया है.

-- दीपंकर भट्टाचार्य

वर्षः 13
अंकः 6